शहादत के शब्द
أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَٰهَ إِلَّا ٱللَّهُ وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ ٱللَّهِ
अश्हदु अल्ला इलाहा इल्लल्लाहु, व अश्हदु अन्ना मुहम्मदर रसूलुल्लाह — मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं, और मैं गवाही देता हूँ कि मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं।
ला इलाहा इल्लल्लाह
لَا إِلَٰهَ إِلَّا ٱللَّه
इनकार और इक़रार: हर झूठे माबूद का इनकार और केवल अल्लाह के लिए इबादत का इक़रार (तौहीद)।
मुहम्मदुर रसूलुल्लाह
مُحَمَّدٌ رَسُولُ ٱللَّه
उनकी दी हुई ख़बरों पर ईमान, उनके हुक्म का पालन, उनकी मना की हुई चीज़ों से बचना, और अल्लाह की इबादत केवल उनके सिखाए तरीक़े से करना।
सात शर्तें
विद्वानों ने ये शर्तें क़ुरआन और सुन्नत से निकाली हैं ताकि गवाही सार्थक और स्वीकार्य हो।
| शर्त | अरबी | अर्थ |
|---|---|---|
| इल्म (ज्ञान) | العِلْم | यह जानना कि गवाही किसका इनकार और किसका इक़रार करती है |
| यक़ीन | اليَقِين | बिना शक के पक्का विश्वास |
| क़बूल करना | القَبُول | दिल और ज़बान से इसकी माँगों को स्वीकार करना |
| फ़रमाँबरदारी | الانْقِيَاد | इस पर अमल करना और अल्लाह के आदेशों के आगे झुकना |
| सच्चाई | الصِّدْق | इसे ईमानदारी से कहना, मुनाफ़िक़ की तरह नहीं |
| इख़लास | الإِخْلَاص | इसे केवल अल्लाह के लिए कहना, शिर्क से पाक |
| मुहब्बत | المَحَبَّة | अल्लाह, उसके रसूल और गवाही की माँगों से मुहब्बत |
ईमान के छह स्तंभ
हदीस-ए-जिब्रील में नबी ﷺ ने ईमान की परिभाषा दी: “कि तुम अल्लाह, उसके फ़रिश्तों, उसकी किताबों, उसके रसूलों और आख़िरत के दिन पर ईमान लाओ, और तक़दीर पर, उसकी भलाई और बुराई पर ईमान लाओ।” (सहीह मुस्लिम 8)
अल्लाह पर ईमान
उसका अस्तित्व, उसका रब होना, केवल उसी का इबादत का हक़, और उसके सुंदर नाम और गुण।
उसके फ़रिश्ते
नूर से पैदा किए गए, बिना चूके अल्लाह का आदेश मानते हैं — उनमें जिब्रील, मीकाईल और इसराफ़ील हैं।
उसकी किताबें
तौरात, ज़बूर, इंजील, इब्राहीम और मूसा के सहीफ़े, और अंतिम, सुरक्षित वह्य के रूप में क़ुरआन।
उसके रसूल
आदम से लेकर मुहम्मद ﷺ तक, जो ख़ातमुन-नबिय्यीन हैं और जिनके बाद कोई नबी नहीं।
आख़िरत का दिन
मौत, क़ब्र, दोबारा जी उठना, हिसाब, मीज़ान, पुल-सिरात, जन्नत और जहन्नम।
तक़दीर (क़दर)
हर चीज़ के बारे में अल्लाह का इल्म, लिखना, इरादा और पैदा करना, जबकि लोग अपने चुनाव के लिए जवाबदेह रहते हैं।
इस्लाम, ईमान और एहसान
- 1
इस्लाम — बाहरी फ़रमाँबरदारी
पाँच स्तंभ: शहादत, नमाज़, ज़कात, रोज़ा और हज।
- 2
ईमान — भीतरी विश्वास
दिल में मज़बूती से रखे गए ईमान के छह स्तंभ।
- 3
एहसान — उत्कृष्टता
“कि तुम अल्लाह की इबादत इस तरह करो मानो तुम उसे देख रहे हो, और अगर तुम उसे नहीं देखते तो वह तुम्हें ज़रूर देख रहा है।” (सहीह मुस्लिम 8)
सुन्नी मुसलमान क़ुरआन और सुन्नत का पालन उसी समझ के साथ करते हैं जो सहाबा और शुरुआती पीढ़ियों की थी। अक़ीदे में अधिकतर असरी, अशअरी या मातुरीदी मसलक पर हैं; फ़िक़्ह में चार मसलकों में से किसी एक पर।
इस्लाम कैसे क़बूल करें
- 1
समझें और ईमान लाएँ
गवाही का अर्थ जानें और सच्चे दिल से उस पर ईमान लाएँ।
- 2
शहादत पढ़ें
أَشْهَدُ أَنْ لَا إِلَٰهَ إِلَّا ٱللَّهُ وَأَشْهَدُ أَنَّ مُحَمَّدًا رَسُولُ ٱللَّهِ
Ashhadu an la ilaha illallah, wa ashhadu anna Muhammadan rasulullah
गवाह रखना अच्छा है पर ज़रूरी नहीं। पिछले सभी गुनाह माफ़ हो जाते हैं।
- 3
ग़ुस्ल करें
इस्लाम में दाख़िल होने पर कई विद्वानों के अनुसार मुस्तहब और कुछ के अनुसार ज़रूरी।
- 4
नमाज़ सीखें
वुज़ू और पाँच वक़्त की नमाज़ से शुरुआत करें, अल-फ़ातिहा और छोटी सूरतें धीरे-धीरे याद करें।
- 5
समुदाय से जुड़ें
स्थानीय मस्जिद या कोई भरोसेमंद उस्ताद क़दम-ब-क़दम सीखने में मदद कर सकते हैं।
सवाल
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या मुसलमान बनने के लिए गवाहों की ज़रूरत है?
नहीं। व्यक्ति सच्चे दिल से ईमान लाकर और शहादत पढ़कर मुसलमान बन जाता है। दूसरों के सामने पढ़ने से समुदाय में पहचान और निकाह व दफ़न जैसे व्यावहारिक मामलों में आसानी होती है।
क्या मुझे अपना नाम बदलना होगा?
नहीं। नाम तभी बदलना ज़रूरी है जब उसका अर्थ इस्लाम के ख़िलाफ़ हो (जैसे अल्लाह के सिवा किसी की बंदगी)। बहुत से नए मुसलमान अपना नाम रखते हैं।
तौहीद क्या है?
तौहीद अल्लाह की एकता है: उसके रब होने में, केवल उसी के इबादत के हक़दार होने में, और उसके नामों और गुणों में। यही ला इलाहा इल्लल्लाह का मूल अर्थ है।