इस्लामी विरासत कैलकुलेटर الفرائض
क़ुरआन और सुन्नत के अनुसार हर वारिस का हिस्सा, चारों सुन्नी मसलकों के नियमों के साथ।
यह कैसे काम करता है
बँटवारे से पहले
पहले कफ़न-दफ़न का ख़र्च, फिर क़र्ज़, फिर ग़ैर-वारिसों के लिए वसीयत (एक-तिहाई तक) अदा की जाती है। बाक़ी वारिसों में बाँटा जाता है।
निर्धारित हिस्से और बाक़ी
निर्धारित हिस्से वाले वारिस (असहाब-उल-फ़ुरूज़) — जैसे पति-पत्नी, माता-पिता और बेटियाँ — पहले लेते हैं; बाक़ी सबसे निकट पुरुष रिश्तेदारों (असबा) को जाता है।
औल और रद्द
अगर निर्धारित हिस्से तर्के से अधिक हों, तो सब अनुपात में घटाए जाते हैं (औल)। अगर कम हों और कोई असबा न हो, तो अतिरिक्त राशि पति/पत्नी के अलावा निर्धारित हिस्से वालों को लौटती है (रद्द)।
शामिल नहीं
दूर के रिश्तेदार (ज़विल-अरहाम), लापता व्यक्ति, गर्भस्थ शिशु, एक साथ मृत्यु, और धर्म के अंतर या हत्या के कारण वंचित वारिसों के मामले किसी आलिम के पास ले जाएँ।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या परिणाम हर देश में मान्य है?
हिस्से क़ुरआन, सुन्नत और चारों मसलकों के अनुसार हैं, जो हर जगह मान्य हैं। भारत में मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीअत) एप्लिकेशन एक्ट 1937 के तहत मुसलमानों की विरासत आमतौर पर इस्लामी नियमों से तय होती है; कुछ देश क़ानून से इनमें बदलाव करते हैं। अपना स्थानीय क़ानून जाँचें और किसी योग्य आलिम से सलाह लें।
बेटे को बेटी का दोगुना क्यों मिलता है?
क़ुरआन ने यह अनुपात तय किया है (सूरह अन-निसा 4:11)। विद्वान बताते हैं कि पुरुष पर महर, घर और परिवार के ख़र्च की आर्थिक ज़िम्मेदारी होती है, जबकि महिला का हिस्सा पूरी तरह उसका अपना होता है।
क्या एक-तिहाई से अधिक की वसीयत कर सकते हैं?
एक-तिहाई से अधिक की वसीयत, या किसी वारिस के लिए वसीयत, के लिए दूसरे वारिसों की सहमति ज़रूरी है।
कौन सा मसलक चुनें?
जो मसलक आपके देश या परिवार में माना जाता है — भारत में अधिकतर हनफ़ी। ज़्यादातर मामलों में मसलक सहमत हैं और मुख्य रूप से भाई-बहनों के साथ दादा, मुश्तरका मसले और पिता की मौजूदगी में दादी के मामले में अलग हैं।